शनिवार, 29 नवंबर 2008

गोश्त बस


वह काला चील्ह...!!

क्या तुमने देखा नहीं उसे...
जाना नहीं...??


है बस काला...
सर से पाँव तक...
फैलाये अपने बीभत्स पंख काले
शून्य में मंडराता रहता है
इधर-उधर
गोश्त की आस में
आँखों को मटमटाता
अवसर की ताक में....


चाहिये उसे गोश्त बस
....लबालब खून से भरा
नर हो या मादा
शिशु हो नन्हा-सा
या कोई पालतु पशु ही


काला हो या उजला
हो लाल या मटमैला
उसे चाहिये गोश्त बस!

...................................................................

37 टिप्‍पणियां:

Akshaya-mann ने कहा…

hai bhagwaan!
jhanjhor dala kya kahuin ab kuch nahi kaha jata....
bas yahi kahuinga aapme bahut himmat hai jo desh ke dard ko is roop mei dhala......
bhartiya naari ke sahas ka roop mila dekhne ko aapki is rachna mei

एक दर्पण,दो पहलू और ना जाने कितने नजरिये /एक सिपाही और एक अमर शहीद का दर्पण और एक आवाज
अक्षय,अमर,अमिट है मेरा अस्तित्व वो शहीद मैं हूं
मेरा जीवित कोई अस्तित्व नही पर तेरा जीवन मैं हूं
पर तेरा जीवन मैं हूं

अक्षय-मन

पुरुषोत्तम कुमार ने कहा…

इसे कहते हैं देर आयद दुरुस्त आयद। काफी दिनों से आपकी कोई नई रचना नहीं आ रही थी। अब यह कविता वाकई लाजवाब है। बहुत सुंदर। आपको बधाई। अगली कविता का इंतजार रहेगा।

प्रहार - महेंद्र मिश्रा ने कहा…

बहुत सुंदर आपको बधाई...

Akshaya-mann ने कहा…

sirf nari ke sine mei hi dil aur wo shakti kyun hoti hai......?

wo hi samajhti hai jisne khoya hai apna
beta,apni beti,apna bhai,apna pati phir bhi
wo hi kyun aage badti hai..

uske paas dil bhi hai aur shakti bhi apne aap mei har jagha purn har tarf se viksit.....


->adhura mein huin bas "main"...

shkti hai to dil nahi kisi ko bhi nahi dekhta kisi ko bhi nahi bakshta....

aur dil hai to shakti nahi kisi par julm hote dekh to sakta hai

aur char aansu baha sakta hai par us julm rok nahi sakta na koshish karta rokne ki.....

ye "main" huin "main" ek "aadmi"

dr. ashok priyaranjan ने कहा…

जीवन िस्थितयों को आपने बडे यथाथॆपरक ढंग से शब्दबद्ध िकया है । अच्छा िलखा है आपने । शब्दों में यथाथॆ की अिभव्यिक्त है । साथ ही कई प्रश्न उठाकर आपने सामाियक संदभोॆं से मन को झकझोर िदया है । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख िलखा है । समय हो तो पढें और प्रितिक्रया भी दें -
http://www.ashokvichar.blogspot.com

जीवन सफ़र ने कहा…

संवेदना जो प्रकट हुई शब्दों के रुप में|बहुत अच्छी रचना|बधाई|

Zakir Ali 'Rajneesh' ने कहा…

सटीक वर्णन। इस कविता की टिप्‍पणी में इससे ज्‍यादा कहूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा।

BrijmohanShrivastava ने कहा…

बस यही तरीका है बात कहने का /आतंक शब्द भी प्रयोग नहीं हुआ और सब कुछ कह डाला

नीरज गोस्वामी ने कहा…

संध्या जी आप ने जो चित्र अपनी रचना में खींचा है वो भयावह है, लेकिन सच है...बहुत अच्छा लिखा है आपने...
नीरज

Dr.Bhawna ने कहा…

सटीक वर्णन...

तीसरा कदम ने कहा…

काफी संगीन स्थिति प्रकट की आपने.

bahadur patel ने कहा…

bahut achchhi kavita hai. apane under tone me bahut khubi ke sath apani bat ko kaha hai.

Reetesh Gupta ने कहा…

यथार्थ चित्रण करती एक जानदार कविता ..
मेरे ब्लाग पर आने का शुक्रिया
ऎसा ही स्नेह बनाये रखें...धन्यवाद

रीतेश गुप्ता

"अर्श" ने कहा…

bahot hi umda aur prabhavi lekhan.. lekhani ki asim kripa hai .... bahot khub jari rahe.... dhero badhai aapko...

संदीप शर्मा Sandeep sharma ने कहा…

बेहतरीन...

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

behtreen veicharik abhivyakti

संतोष कुमार सिंह ने कहा…

आप की राय अपेक्षित हैं,------ दिलों में लावा तो था लेकिन अल्फाज नहीं मिल रहे थे । सीनों मे सदमें तो थे मगर आवाजें जैसे खो गई थी। दिमागों में तेजाब भी उमङा लेकिन खबङों के नक्कारखाने में सूखकर रह गया । कुछ रोशन दिमाग लोग मोमबत्तियों लेकर निकले पर उनकी रोशनी भी शहरों के महंगे इलाकों से आगे कहां जा पाई । मुंबई की घटना के बाद आतंकवाद को लेकर पहली बार देश के अभिजात्य वर्गों की और से इतनी सशंक्त प्रतिक्रियाये सामने आयी हैं।नेताओं पर चौतरफा हमला हो रहा हैं। और अक्सर हाजिर जवाबी भारतीय नेता चुप्पी साधे हुए हैं।कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि आजादी के बाद पहली बार नेताओं के चरित्र पर इस तरह से सवाल खङे हुए हैं।इस सवाल को लेकर मैंने भी एक अभियाण चलाया हैं। उसकी सफलता आप सबों के सहयोग पर निर्भर हैं।यह सवाल देश के तमाम वर्गो से हैं। खेल की दुनिया में सचिन,सौरभ,कुबंले ,कपिल,और अभिनव बिद्रा जैसे हस्ति पैदा हो रहे हैं । अंतरिक्ष की दुनिया में कल्पना चावला पैदा हो रही हैं,।व्यवसाय के क्षेत्र में मित्तल,अंबानी और टाटा जैसी हस्ती पैदा हुए हैं,आई टी के क्षेत्र में नरायण मुर्ति और प्रेम जी को कौन नही जानता हैं।साहित्य की बात करे तो विक्रम सेठ ,अरुणधति राय्,सलमान रुसदी जैसे विभूति परचम लहराय रहे हैं। कला के क्षेत्र में एम0एफ0हुसैन और संगीत की दुनिया में पंडित रविशंकर को किसी पहचान की जरुरत नही हैं।अर्थशास्त्र की दुनिया में अमर्त सेन ,पेप्सी के चीफ इंदिरा नियू और सी0टी0 बैक के चीफ विक्रम पंडित जैसे लाखो नाम हैं जिन पर भारता मां गर्व करती हैं। लेकिन भारत मां की कोख गांधी,नेहरु,पटेल,शास्त्री और बराक ओमावा जैसी राजनैतिक हस्ति को पैदा करने से क्यों मुख मोङ ली हैं।मेरा सवाल आप सबों से यही हैं कि ऐसी कौन सी परिस्थति बदली जो भारतीय लोकतंत्र में ऐसे राजनेताओं की जन्म से पहले ही भूर्ण हत्या होने लगी।क्या हम सब राजनीत को जाति, धर्म और मजहब से उपर उठते देखना चाहते हैं।सवाल के साथ साथ आपको जवाब भी मिल गया होगा। दिल पर हाथ रख कर जरा सोचिए की आप जिन नेताओं के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं उनका जन्म ही जाति धर्म और मजहब के कोख से हुआ हैं और उसको हमलोगो ने नेता बनाया हैं।ऐसे में इस आक्रोश का कोई मतलव हैं क्या। रगों में दौङने फिरने के हम नही कायल । ,जब आंख ही से न टपके तो फिर लहू क्या हैं। ई0टी0भी0पटना

jayaka ने कहा…

dil ko chhoo jaane wali. ek utkrishta rachana aapane pesh ki hai!...dhanyawad!

kkyadav ने कहा…

बेहद लाजवाब और सुन्दर प्रस्तुति.

Dr. Ajay Shukla ने कहा…

Lahu me lipti manavta ka saziv chitran.
Aisi kavita ke liye sadhuwaad.

मीत ने कहा…

वाह! संध्या जी..
आपके ब्लॉग को पढ़कर मन एकदम प्रफुलित हो गया...
बहुत अच्छा लिखती हैं...
आज से आप भी मेरी ब्लॉग लिस्ट में शामिल...
अच्छा लिखना जारी रहे...
---मीत

abhivyakti ने कहा…

mere blog par aane ke liye dhanyawaad.aapki rachnaye ooj aur bhawukta ka samanvit roop hain.....jangali bel ki muhim bahut aage tak jayegi.
-dr.jaya

अरविन्द श्रीवास्तव ने कहा…

अभिवादन, कविताएं पढता रहा हूँ, कई-कई बार पढना चाहूंगा…।

kmuskan ने कहा…

pahli baar aapke blog par aayi .bahut sunder abhivyakti ....badhai

राज भाटिय़ा ने कहा…

संध्या जी आप ने कविता के माध्यम से आज कल के हालत बतला दिये, बहुत सुंदर.
धन्यवाद

manu ने कहा…

be had vibhast drashy dikha diya sandhyaa ji ......jawaab nahi aapki kalam ka
kamaal...
aur raj thaakre wala to
laajwaab.........

Poonam Agrawal ने कहा…

Samkaleen sunder rachna.....next post ka besabri se intjaar rahega.

Badhai....

प्रदीप मानोरिया ने कहा…

काला हो या उजला
हो लाल या मटमैला
उसे चाहिये गोश्त बस!
यथार्थ चिंतन और प्रवाहित वर्णन बहुत सुंदर बधाई

manu ने कहा…

sab log aakhiri post pe comment likhte hain aksar.....
aapne whhan likh jahan aapko thek lagaa...
ye baat behad bhaai mujhe..........

डॉ .अनुराग ने कहा…

चाहिये उसे गोश्त बस
....लबालब खून से भरा
नर हो या मादा
शिशु हो नन्हा-सा
या कोई पालतु पशु ही


काला हो या उजला
हो लाल या मटमैला
उसे चाहिये गोश्त बस!





सिहर गया हूँ !मै भी .....इस सच से

Rakesh Kumar Singh ने कहा…

bhayawah lekin wastwik chitran kiya hai aapne.Saadhuwaad.

vandana ने कहा…

sach kaha........shabd hi nahi bache kucch kehne ke liye.............katu satya hai

hempandey ने कहा…

हवसी , जिसकी सारी सम्वेदनाएँ मर गयी हों -
उसे चाहिये गोश्त बस!
आपकी कवितायें बहुत गहरा प्रभाव छोड़ती हैं.

सुशील कुमार ने कहा…

टिप्पणियाँ देते तो हैं लोग,पर बताते नहीं कि क्यों अच्छी लगी।पता नहीं उनके पास अल्फ़ाज नहीं हैं या फिर यूँ ही प्रसन्न करने के लिये कुछ लिख देते हैं।अब तक की कुल टिप्पणियों में एक भी यह नहीं इंगित करता कि यह रचना यदि सुघड़ है तो क्यों है?

सुशील कुमार ने कहा…

‘गोश्त बस’ संध्या जी की पुन: क्रूर पूँजीवादी-सामंतवादी ताक़तों के विरुद्ध एक आवाज़ है, आदमी के अंतस में एक आगाज करती हुयी। अक्सर देखा गया है कि स्त्री-कवि स्त्री-विमर्श से आगे की कविता लिखने में रुचि नहीं लेती,न साहस ही दिखाती है। पर संध्या की कवितायें इस विचार का प्रतिलोम हैं और यही स्त्री-लेखन की सही स्वच्छंदता भी है। वह अपने रचना-संसार में लगातार सीमाओं का अतिक्रमण करती हुयी फैल रही हैं जो उनके कविता को वृहत्तर आयाम देता है। नारी-विमर्श के नाम पर विमर्शवादी लेखक-आलोचक जो कर रहे हैं उनकी कथनी-करनी में बड़ा फ़र्क है क्योंकि वहाँ विमर्श एक तरह की राजनीति का शिकार है। मेरा मानना है कि जब कविताओं का स्वरुप जनवादी होगा और वह लोक के मूल्यों को स्थापित करने के फलितार्थ प्रतिबद्ध होगी तो नारी,दलित, कमजोर,शोषित यानि पूरा अभिवंचित वर्ग स्वमेव उसकी लेखनी का हिस्सा बन जायेंगे। उसके लिये अलग से या प्रायोजित लेखन की आवश्यकता नहीं।

प्रस्तुत कविता पूरा का पूरा बिम्बाधारित ही है। वह काला चील क्या है ? उसके वीभत्स डैने किसको अपनी आगोश में लेते हैं? अवसरवादिता क्या आज की क्षुद्र राजनीति का हिस्सा नहीं? और और उसकी करनी संध्या जी की पंक्तियों में ही चरितार्थ नहीं है? देखिये-
“चाहिये उसे गोश्त बस
....लबालब खून से भरा
नर हो या मादा
शिशु हो नन्हा-सा
या कोई पालतु पशु”
यही आज के साठ साला जनतन्त्र की अपनी प्रतिच्छाया है जिसकी ओट में वह चील रूपी दानवी शक्ति जनगण की छाती पर आज भी मूँग दल रही है। वह सामंती-शक्ति तंत्र पर राज करती हुयी आज भी जनता की गोश्त,उसके ख़ून-पसीने की कमाई को नोंच रही है।
छोटी पहल की इस कविता में श्रीमती गुप्ता ने प्रगतिशील-जनवादी काव्य-विवेक को बहुत सलीके से और गंभीरता से रखा है। मेरी शुभकामनायें।
-सुशील कुमार। (sk.dumka@gmail.com)
http://www.sushilkumar.net
http://diary.sushilkumar.net

प्रदीप मानोरिया ने कहा…

बहुत गज़ब के कविता है सच में बहुत मज़ा आया एक एक लाइन में आपका विचार चिंतन बहुत अलग है

rekhamaitra ने कहा…

Sandhyaji,
aap ek bahut samvedansheel rachnakar hain,sabhee kavitayen jo yahan mein par sakee hoon;asardar hein. mujhe apkee Prarthana ne sabse adhik chhua hai. Badhaee sweekar karen!!!!!!!!!!