
यह कोई बहुत व्याकुल कर देने वाली
जैसे युद्ध के दिनों की नींद है
देखना-
जैसे हहराकर वेग से बहती हुई नदी को
जैसे समुद्र पार करने की इच्छा से भरी
चिड़ियों का थक कर अथाह जल राशि में
समाने के पहले की अनुभूति
यह उम्र बढ़ती जा रही है
घट रहा है हमारे भीतर आवेग
मिट रही हैं स्मृतियाँ उसी गति में
मेरी व्याकुलता
जैसे लड़ाई के दिनों में एक सैनिक का
परिवार को लिखा पत्र
और उसके लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाने की पीड़ा में
घुला जीवन!
बहुत धीरे- धीरे व्यतीत हो रहा है यह समय
हमारे ही बुने जाल में
बड़े कौशल से उलझ गयी है हमारी नींद
जैसे
मैं किसी सौदे में व्यस्त हूँ
और खिड़की से बाहर कोई रेल मेरी नींद में
धड़धडाती हुई गुज़र रही है रोज़ !
..............................................................................
SLUMBER
As if it’s a slumber
From the warring days
Leaving one deep in anxiety
As if it’s a vigil on the river
As it roars away
In fury
As if it's the moment before
The plunge into endless waters
By the sparrows
Tired beyond their will
To get across the sea
Years grow on us
And some passion within ebbs
Memories dying along the way
One’s anxiety -
As if its a lifetime suffered
In a letter from the battlefield
That never arrived
Slow moves the time
And our slumber gets enmeshed
Skilfully
Into a web we’ve made ourselves
It’s as if in the thick of a deal
A train rattles past my window
Into my dream
Everyday
....................................................
Translated from Hindi by Girdhar Rathi
******************************************
चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार
.............................................................................
55 टिप्पणियां:
आदरणीया संध्या जी
नमस्कार !
बहुत समय से आपकी नई रचना की प्रतीक्षा कर
रहा था …
नींद पढ़ कर मन अकुलाहट से भर गया । कितनी अलग अलग अनुभूतियों का सजीव चित्रण किया है आपने !
समुद्र पार करने की इच्छा से भरी
चिड़िया के थक कर अथाह जल राशि में
समाने के पहले की अनुभूति
और
लड़ाई के दिनों में सैनिक का
परिवार को लिखा पत्र
और उसके लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाने की पीड़ा
विवशता की अभिव्यक्ति के लिए क्या ख़ूब बिंबों का प्रयोग … अद्भुत !
… और कविता को ला'कर कहां छोड़ा …
मैं किसी सौदे में व्यस्त हूं ,
और खिड़की से बाहर कोई रेल मेरी नींद में
धड़धडाती हुई गुज़र रही है रोज़ !
शब्दों द्वारा उकेरे गए अप्रतिम अनुपम चित्रों के लिए कोटिशः बधाई !
गिरधर राठी जी द्वारा किये गए अंग्रेजी अनुवाद को देख कर मेरी भी इच्छा हो आई है , राजस्थानी में अनुवाद की ।
शुभकामनाओं सहित …
- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं
बहुत गहन रचना...
डूब गये पढ़ते.
वाह!
Sandhya ji..
Maut ki aahat jo aati..
Ek dar bhi sang laati..
Apnon se bichhudenge ab wo..
Sang ye ahsaas laati..
Aapne un palon ki anubhuti ko jeevant kar diya..
Hum sab dheere astahchal ki taraf kadam badhate ja rahe hai.. Bina jaane ki es bhavsagar se paar ho bhi paayenge ya thak kar pahle hi jalsmadhi main vileen ho jayenge..
Aapke blog par yah meri pahli tippani hai.. Koi truti ho to kshama keejiyega..
Deepak..
बहुत ही मनमोहक कविता..... द्वंद्व को कितनी खूबसूरती से दिखाया है आपने... नींद के बहाने... एन्डिंग तो बहुत ही ग़ज़ब की है.....
और इंग्लिश ट्रांसलेलेशन बहुत ही ख़ूबसूरत है.......
जागते हुए नींद का सपना ।
1
आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया! भले ही मैं विदेश में क्यूँ न रहूँ पर अपने देश को कभी भूल नहीं सकती और मुझे भारतीय होने पर गर्व है!
यह उम्र बढ़ती जा रही है
घट रहा है हमारे भीतर आवेग
मिट रही हैं स्मृतियाँ उसी गति में...
बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! पेंटिंग बड़ा ही चमत्कार लगा! आपने बहुत ही शानदार, लाजवाब और मनमोहक रचना लिखा है और साथ में अंग्रेजी में अनुवाद भी बेहतरीन लगा! उम्दा प्रस्तुती!
बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति……………बाकी समिक्षा तो राजेंद्र जी ने कर ही दी और उनसे सहमत हूँ।
"देखना-
जैसे हहराकर वेग से बहती हुई नदी को"
"हमारे ही बुने जाल में
बड़े कौशल से उलझ गयी है हमारी नींद"
सबसे पहले तो चित्र जो लगाया आपने...वो बिलकुल सापेक्ष है, खुद में एक कविता है...
आपकी कविता पर कुछ कहना मेरे लिए कतई उचित नहीं ये मैं मानता हूँ.
सिर्फ ख़ूबसूरत कह कर इसे तोड़ नहीं सकता...कहूँगा कविता एक रेल ही है जो अभी भी अन्दर गुज़र रही है.
And the plunges of this translation are strong and deep...
To conclude.... thanks for both of them.
संध्या जी ,
बहुत दिनी बाद आपकी रचना आई ...
यह उम्र बढ़ती जा रही है
घट रहा है हमारे भीतर आवेग
मिट रही हैं स्मृतियाँ उसी गति में
इन पंक्तियों ने मुझे भी जगा सा दिया है ..
बहुत धीरे- धीरे व्यतीत हो रहा है यह समय
हमारे ही बुने जाल में
बड़े कौशल से उलझ गयी है हमारी नींद
सटीक बात कही है ...ज़िंदगी न जाने क्या क्या बुन लेती है ..
और रेल का प्रतिबिम्ब लाजवाब है ....
अभि तक आपकी कविता में खोयी हुई हूँ ...चित्र सापेक्ष है ...
यह उम्र बढ़ती जा रही है
घट रहा है हमारे भीतर आवेग
मिट रही हैं स्मृतियाँ उसी गति में ..
कशमकश और जीवन के द्वंद को बाखूबी उतारा है आपने अपनी इस रचना में ...
Kai bar padha.Har baar ek naya arth mila.Kabhi na bhulne wali adbhut rachna.
Ajay Shukla
मैं किसी सौदे में व्यस्त हूँ
और खिड़की से बाहर कोई रेल मेरी नींद में
धड़धडाती हुई गुज़र रही है रोज़ !
sidhe sidhe sabdon me kahi gai ye panktiyan bahut kuchh kahti hain.
संध्या जी,
एक गंभीर प्रभाव अंतर्मन पर छोड़ जाती है आपकी कविता, हर बार पढ़ने पर अलग विश्लेषण आता है मष्तिष्क में. कुछ पंक्तियाँ सो बहुत लाजबाब बन पड़ी हैं
"जैसे हहराकर वेग से बहती हुई नदी को
जैसे समुद्र पार करने की इच्छा से भरी
चिड़ियों का थक कर अथाह जल राशि में
समाने के पहले की अनुभूति".
एवं
"हमारे ही बुने जाल में
बड़े कौशल से उलझ गयी है हमारी नींद"
अंग्रेजी अनुवाद काफी सुंदर है
बहुत बहुत शुक्रिया सुंदर रचना से रसविभोर करने के लिए.
मेरे ब्लॉग पर आने के लिए शुक्रिया.
sndhyaa bhn nind ki becheni ka andaaz pesh krne kaa anuthaa triqa he mubaarkbaad qubul kren. akhtar khan akela kota rajsthan
आज के भयावह समय की कहानी कहती कविता !
दिल की कश्मोकाश को सुंदर शब्दों के ताने बाने में बुना है. सुंदर कृति.
इतनी गहन विवेचना । अप्रतिम । राठी जी का अनुवाद भी उसी स्तर का है , अंग्रेजी मे भी स्तर और भाव लगभग बनाये हुए है ।
"हमारे ही बुने जाल में
बड़े कौशल से उलझ गयी है हमारी नींद"
आभार
मेरी व्याकुलता
जैसे लड़ाई के दिनों में एक सैनिक का
परिवार को लिखा पत्र
और उसके लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाने की पीड़ा में
घुला जीवन!
बहुत धीरे- धीरे व्यतीत हो रहा है यह समय
हमारे ही बुने जाल में
बड़े कौशल से उलझ गयी है हमारी नींद
जैसे
मैं किसी सौदे में व्यस्त हूँ
और खिड़की से बाहर कोई रेल मेरी नींद में
धड़धडाती हुई गुज़र रही है रोज़ !
bahut gahri rachna hai ,main to bahut dhyaan se padhti rahi aur phir maun ho kar is vishya par sochati rahi ,bebasi ,laachari din pratidin khokhla kar rahi man ko .aur dhundhali padti jaa rahi aas ......
आप की रचना 20 अगस्त, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
http://charchamanch.blogspot.com
आभार
अनामिका
संध्या जी,
खूबसूरत अभिव्यक्ति।
यह उम्र बढ़ती जा रही है
आपकी कविताएँ पढ़ी... अच्छी लगी !!
shaandar abhivyakti, man ki uho-poh kodarshati hui, shabd sanyojan achha he, aap apni bat keh payi,
badhai
यह उम्र बढ़ती जा रही है
घट रहा है हमारे भीतर आवेग
मिट रही हैं स्मृतियाँ उसी गति में
गहन चिंतन, सहज सुन्दर भावाभिव्यक्ति...
ठहरकर सोचने को बाध्य करती,सार्थक करने को उत्सुक करती..बहुत ही सुन्दर रचना...मन को छू गयी यह...
बेहद सुन्दर रचना ..पढ़ते पढ़ते कहीं गुम से हो गए ..बहुत खूब
मेरी व्याकुलता
जैसे लड़ाई के दिनों में एक सैनिक का
परिवार को लिखा पत्र
और उसके लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाने की पीड़ा में
घुला जीवन!
बहुत धीरे- धीरे व्यतीत हो रहा है यह समय
हमारे ही बुने जाल में
बड़े कौशल से उलझ गयी है हमारी नींद
सीमा जी ! बेहद खूबसूरत पंक्तियाँ हैं ..दिल की जद्दोजहद जैसे घुल सी गई है शब्दों में ..बहुत सुन्दर.
sandhya ji bahut hi gahri avam jeevant rachna .antardwand ko bahut hi kushalta se abhivyakt kiya hai.
poonam
नींद को द्रष्टा बन देखने का सफल प्रयास और इस प्रयास से निकली मार्मिक अभिव्यक्ति.
..बधाई.
रक्षाबंधन पर हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!
बहुत गहराई से लिखा आपने......सुन्दर कविता ...बधाई.
मेरी व्याकुलता
जैसे लड़ाई के दिनों में एक सैनिक का
परिवार को लिखा पत्र
और उसके लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाने की पीड़ा में
घुला जीवन!
sachmuch, yahi vyakulata hoti hai
WAAH WAAH AUR BAS WAAH ..
PADHKAR HI JO GAHRIU ANUBHOOTI HUI HAI ..USKE BAARE ME KYA KAHE.. MAN BHAR SA GAYA HAI ..AAP BAHUT ACCHA LIKHTI HAI , BADHAYI SWEEKAR KARE..
VIJAY
आपसे निवेदन है की आप मेरी नयी कविता " मोरे सजनवा" जरुर पढ़े और अपनी अमूल्य राय देवे...
http://poemsofvijay.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html
यह उम्र बढ़ती जा रही है
घट रहा है हमारे भीतर आवेग
मिट रही हैं स्मृतियाँ उसी गति में
और
बहुत धीरे- धीरे व्यतीत हो रहा है यह समय
हमारे ही बुने जाल में
बड़े कौशल से उलझ गयी है हमारी नींद
-सुन्दर
उत्कृष्ट रचना |नींद को लेकर इतने सुन्दर प्रतिबिम्ब |वाह !
बहुत धीरे- धीरे व्यतीत हो रहा है यह समय
हमारे ही बुने जाल में
बड़े कौशल से उलझ गयी है हमारी नींद
Beautifully translated !
aapki racnaye dil ko chhu leti hai...bahut sundar!
dhanywad!
यह नींद बेचैन कर गई । हम में से बहुत लोग कभी न कभी ऐसी अकुलाहट महसूस करते हैं ।
अनुवाद भी सुंदर । आप को और राठी जी को बधाई ऐसी सुंदर रचना के लिये ।
जैसे
मैं किसी सौदे में व्यस्त हूँ
और खिड़की से बाहर कोई रेल मेरी नींद में
धड़धडाती हुई गुज़र रही है रोज़ !-----------------बेहतरीन पंक्तियां सन्ध्या जी,नींद को लेकर आपने बहुत खूबसूरती के साथ आज के भयावह सच को उजागर किया है।
एक सुंदर अभिव्यक्ति -समय को जाता देख सकना नहीं उसको अनुभव करना आसन नहीं होता ।
लाजवाब...
The English version is something new for me... great effort
सर्वप्रथम खलील जिब्रान पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया.......आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा .......दिल को छू लेने वाली एक उच्च कोटि की साहित्यिक अभिव्यक्ति वाली कविता लिखी है आपने .........मेरी शुभकामनाये.....ये पंक्तियाँ बहुत पसंद आयीं -
"मेरी व्याकुलता
जैसे लड़ाई के दिनों में एक सैनिक का
परिवार को लिखा पत्र
और उसके लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाने की पीड़ा में
घुला जीवन!"
कभी फुरसत मिले तो हमारे ब्लॉग पर भी आईएगा -
http://jazbaattheemotions.blogspot.com/
http://mirzagalibatribute.blogspot.com/
http://khaleelzibran.blogspot.com/
http://qalamkasipahi.blogspot.com/
डा. संध्याजी,
बहुत प्रभावशाली कविता है। खासतौर पर आपने जो बिंब बुने हैं वे सीधे लक्ष्य तक जाते हैं. एक कुशल तीरंदाज़ के तीर की तरह. हालांकि यह डाक तार विभाग का ताकतवर पक्ष हो सकता है कि वह सैनिकों की चिट्ठियों को भी लापता बना देता है...
नवीन और उमदा अभिव्यक्ति..वाह !!!
आपने मेरे ब्लाग में आकर बहुत देर तक मौन रहने की वाजिब शिकायत की है। इन दिनों मैं ‘‘शल्यचिकित्सा कांड’’ का मूक और पीड़ित पक्षकार बना रहा। वह मैं शीघ्र लेकर आ रहा हूं.
आपकी प्रतीक्षा में भी एक बहुत बड़ी और सबल टिप्पणी का वजन है। यह मुझे ऊर्जित करेगी..
कृतज्ञ हूं...
यह कोई बहुत व्याकुल कर देने वाली
जैसे युद्ध के दिनों की नींद है
मेरी व्याकुलता
जैसे लड़ाई के दिनों में एक सैनिक का
परिवार को लिखा पत्र
और उसके लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाने की पीड़ा में
घुला जीवन!
डा. संध्याजी,
बहुत प्रभावशाली कविता है। खासतौर पर आपने जो बिंब बुने हैं वे सीधे लक्ष्य तक जाते हैं. एक कुशल तीरंदाज़ के तीर की तरह. हालांकि यह डाक तार विभाग का ताकतवर पक्ष हो सकता है कि वह सैनिकों की चिट्ठियों को भी लापता बना देता है...
नवीन और उमदा अभिव्यक्ति..वाह !!!
आपने मेरे ब्लाग में आकर बहुत देर तक मौन रहने की वाजिब शिकायत की है। इन दिनों मैं ‘‘शल्यचिकित्सा कांड’’ का मूक और पीड़ित पक्षकार बना रहा। वह मैं शीघ्र लेकर आ रहा हूं.
आपकी प्रतीक्षा में भी एक बहुत बड़ी और सबल टिप्पणी का वजन है। यह मुझे ऊर्जित करेगी..
कृतज्ञ हूं...
यह कोई बहुत व्याकुल कर देने वाली
जैसे युद्ध के दिनों की नींद है
मेरी व्याकुलता
जैसे लड़ाई के दिनों में एक सैनिक का
परिवार को लिखा पत्र
और उसके लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाने की पीड़ा में
घुला जीवन!
डा. संध्याजी,
बहुत प्रभावशाली कविता है। खासतौर पर आपने जो बिंब बुने हैं वे सीधे लक्ष्य तक जाते हैं. एक कुशल तीरंदाज़ के तीर की तरह. हालांकि यह डाक तार विभाग का ताकतवर पक्ष हो सकता है कि वह सैनिकों की चिट्ठियों को भी लापता बना देता है...
नवीन और उमदा अभिव्यक्ति..वाह !!!
आपने मेरे ब्लाग में आकर बहुत देर तक मौन रहने की वाजिब शिकायत की है। इन दिनों मैं ‘‘शल्यचिकित्सा कांड’’ का मूक और पीड़ित पक्षकार बना रहा। वह मैं शीघ्र लेकर आ रहा हूं.
आपकी प्रतीक्षा में भी एक बहुत बड़ी और सबल टिप्पणी का वजन है। यह मुझे ऊर्जित करेगी..
कृतज्ञ हूं...
आपको एवं आपके परिवार को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें !
बहुत खूब लिखा आपने.... खूबसूरत अभिव्यक्ति.
श्री कृष्ण-जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें.
जितनी उत्कृष्ट आपकी कविता है उतना ही उत्कृष्ट अनुवाद भी.कवि और अनुवादक दोनों को नमस्कार.
जितनी उत्कृष्ट आपकी कविता है उतना ही उत्कृष्ट अनुवाद भी.कवि और अनुवादक दोनों को प्रणाम.
bahut hi sundar kavita aur anuvad ke liye badhai
बहुत धीरे- धीरे व्यतीत हो रहा है यह समय
हमारे ही बुने जाल में
बड़े कौशल से उलझ गयी है हमारी नींद
जैसे
मैं किसी सौदे में व्यस्त हूँ
और खिड़की से बाहर कोई रेल मेरी नींद में
धड़धडाती हुई गुज़र रही है रोज़ !
पूरी कविता नींद में भी जाग रही है।
आपने कविता को बहुत गहरे जाकर बुना है।
बिंब भी बहुत प्यारे हैं..दुश्यंत त्यागी जी की गजल का एक शेर याद आ रहा है..
तू किसी रेल सी गुजरती है ,
मैं किसी पुल सा थरथराता हूं.
जैसे लड़ाई के दिनों में एक सैनिक का
परिवार को लिखा पत्र
और उसके लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाने की पीड़ा में
घुला जीवन!
सुन्दर विश्लेषण! यह बेचैनी तो पहाड हिला सकती है। इस आग को ज्वलंत रखना है।
ek umda rachna.....
Mere blog par bhi sawaagat hai aapka.....
http://asilentsilence.blogspot.com/
http://bannedarea.blogspot.com/
संध्या जी आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आई और आपकी ये रचना "नींद" पढ़ी वाकई में इसके शब्द शब्द में गहराई है .........एक अकुलाहट ,एक गहरी अनुभूति और जब सबको मापने बैठो तो हर शब्द ज़िन्दगी के पहलु से जुड़ा नज़र आता है........ज़िन्दगी का नाम ही है कभी बेचैनी, हैरानी तो कभी सुकून आपने शब्दों में ज़िन्दगी की कशमकश को उभार दिया है .......
http://rajninayyarmalhotra.blogspot.com/par bhi aaiye kabhi .......
जैसे समुद्र पार करने की इच्छा से भरी
चिड़ियों का थक कर अथाह जल राशि में
समाने के पहले की अनुभूति...ati sundar
मेरी व्याकुलता
जैसे लड़ाई के दिनों में एक सैनिक का
परिवार को लिखा पत्र
और उसके लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाने की पीड़ा में
घुला जीवन!
vyakulta shabdo me dikh rahi hai..:)
bahut pyari rachna.......
I m speechless!!
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