शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2008

एक गैर दुनियादार शख्स की मृत्यु पर एक संक्षिप्त विवरण़......

एक विडम्बना ही है और इसे गैर दुनियादारी ही कहा जाना चाहिये
जब शहर में हत्याओं का दौर था.....उसके चेहरे पर शिकन नहीं थी
रातें हिंसक हो गयी थीं और वह चैन से सोता देखा गया

यह वह समय था जब किसी भी दुकान का शटर
उठाया जा रहा था आधी रात को और हाथ
असहाय मालूम पड़ते थे

सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उसके जीवन का यह है कि वह
बोलता हुआ कम देखा गया था

“ दुनिया में किसी की उपस्थिति का कोई ख़ास
महत्व नहीं ”-
एक दिन चैराहे पर
कुछ भिन्नाई हुई मनोदशा में बकता पाया गया था

उसकी दिनचर्या अपनी रहस्यमयता की वजह से अबूझ
किस्म की थी लेकिन वह पिछले दिनों अपनी
खराब हो गई बिजली और कई रोज़ से खराब पड़े
सामने के हैण्डपम्प के लिये चिन्तित देखा गया था

उसे पुलिस की गाड़ी में बजने वाले सायरनों का ख़ौफ़
नहीं था...मदिर की सीढ़ियाँ चढ़ने में भी उसकी
दिलचस्पी कभी देखी नहीं गई

राजनीति पर चर्चा वह कामचोरों का शगल मानता था

यहां तक कि इन्दिरा गांधी के बेटे की हुई मृत्यु को वह
विमान दुघर्टना की वजह में बदल कर नही देखता था

अपनी मौत मरेंगे सब!!!
उस अकेले और गैर दुनियादार शख़्स की राय थी

जब एक दिन तेज़ बारिश हो रही थी
बच्चे, जवान शहर से कुछ बाहर एक उलट गई बस को
देखने के लिये छतरी लिये भाग रहे थे
वह अकेला और

जिसे गैर दुनियादार कहा गया था,
शख़्स इसी बीच रात के तीसरे पहर को मर गया

तीन दिन पहले उसकी बिजली ठीक हो गई थी
और जैसा कि निश्चित ही था कि घर के सामने वाले
हैण्डपम्प को दो या तीन दिनों के भीतर
विभागवाले ठीक कर जाते

उस अकेले और गैर दुनियादार शख़्स का भी
मन्तव्य था कि मृत्यु किसी का इन्तज़ार नहीं करती


पर जो निश्चित जैसा था और इस पर मुहल्लेवालों की
बात भी सच निकली
उसका शव बहुत कठिन तरीके से
और मोड़ कर उसके दरवाजे़ के बाद की
सँकरी गली से निकला!

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10 टिप्‍पणियां:

सागर नाहर ने कहा…

क्या कहूं, बहुत शानदार कविता.. बहुत मार्मिक कविता.. कड़वा सच!!
सही शब्द ही नहीं मिल रहे।

संध्या जी
अगर वर्ड वेरिफिकेशन हटा दिया जाये तो टिप्पणी करने में आसानी होगी।

संजीव तिवारी ने कहा…

स्‍वागत है ................

प्रदीप मानोरिया ने कहा…

आपके संवेदन शील ह्रदय से परिचित कराती सुंदर पंक्तियाँ और गहरे भाव बधाई आपका चिठ्ठा जगत में स्वागत है , निरंतरता की चाहत है मेरे ब्लॉग पर पधारे बेहतरीन रचना

Hari ने कहा…

ब्‍लागजगत में आपका स्‍वागत है।

Sanjeet Tripathi ने कहा…

स्वागत है, शब्दाभिव्यक्ति में सफल हैं आप

श्यामल सुमन ने कहा…

संध्या जी,

जिस शख्स को कहते हैं गुनहगार सभी लोग।
वह शख्स तो मजहब की किताबों की तरह है।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

DHAROHAR ने कहा…

Achi rachna, saadhuwaad.

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

बहुत शानदार कविता..

sandhyagupta ने कहा…

पढ़ कर मंतव्य देने के लिये आप सबों के प्रति आभारी हूँ।
वर्ड वेरिफिकेशन हटा दिया गया है। आशा है आप सबों का स्नेहपूर्ण मार्गदर्शन-मंतव्य मिलता रहेगा।
सधन्यवाद,
संध्या गुप्ता

kumar piyush ने कहा…

Nice poem.