मेरे बारे में

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

फिर मिलेंगे

मित्रों, एकाएक मेरा विलगाव आपलोगों को नागवार लग रहा है, किन्तु शायद आपको यह पता नहीं है की मैं पिछले कई महीनो से जीवन के लिए मृत्यु से जूझ रही हूँ । अचानक जीभ में गंभीर संक्रमण हो जाने के कारन यह स्थिति उत्पन्न हो गयी है। जीवन का चिराग जलता रहा तो फिर खिलने - मिलने का क्रम जारी रहेगा। बहरहाल, सबकी खुशियों के लिए प्रार्थना।

बुधवार, 3 नवंबर 2010

प्रारम्भ में लौटने की इच्छा से भरी हूं!




मैं उसके रक्त को छूना चाहती हूं
जिसने इतने सुन्दर चित्र बनाये
उस रंगरेज के रंगों में घुलना चाहती हूं
जो कहता है-
कपड़ा चला जायेगा बाबूजी!
पर रंग हमेशा आपके साथ रहेगा

उस कागज के इतिहास में लौटने की इच्छा से
भरी हूं
जिस पर
इतनी सुन्दर इबारत और कवितायें हैं
और जिस पर हत्यारों ने इकरारनामा लिखवाया

तवा, स्टोव
बीस वर्ष पहले के कोयले के टुकड़े
एक च्यवनप्राश की पुरानी शीशी
पुराने पड़ गये पीले खत
एक छोटी सी खिड़की वाला मंझोले आकार का कमरा
एक टूटे हुए घड़े के मुहाने को देख कर
....शुरू की गई गृहस्थी के पहले एहसास
को छूना चाहती हूं

अभी स्वप्न से जाग कर उठी हूँ
अभी मृत्यु और जीवन की कामना से कम्पित है
यह शरीर !


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चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार
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सोमवार, 20 सितंबर 2010

सिर्फ स्मृतियाँ नहीं




बरसों बाद
वह भरी दोपहरी में एक दिन मेरे घर आया

इसे संभालो - ये कविताएँ हैं तुम्हारी

मैं हार गया ! !
उसने दरवाज़े के नीचे पुराने दिनों की तरह
चप्पल छोड़े

ये किताबें रख लो
यह पेन भी
अब अपने दुःख की तरह संभाले नहीं संभलता
यह सब

यह आदमी ही है
जो संजोकर सिर्फ स्मृतियाँ ही नहीं रखता !


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चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार
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मंगलवार, 17 अगस्त 2010

नींद




यह कोई बहुत व्याकुल कर देने वाली
जैसे युद्ध के दिनों की नींद है

देखना-
जैसे हहराकर वेग से बहती हुई नदी को

जैसे समुद्र पार करने की इच्छा से भरी
चिड़ियों का थक कर अथाह जल राशि में
समाने के पहले की अनुभूति

यह उम्र बढ़ती जा रही है
घट रहा है हमारे भीतर आवेग
मिट रही हैं स्मृतियाँ उसी गति में

मेरी व्याकुलता
जैसे लड़ाई के दिनों में एक सैनिक का
परिवार को लिखा पत्र
और उसके लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाने की पीड़ा में
घुला जीवन!

बहुत धीरे- धीरे व्यतीत हो रहा है यह समय
हमारे ही बुने जाल में
बड़े कौशल से उलझ गयी है हमारी नींद

जैसे
मैं किसी सौदे में व्यस्त हूँ
और खिड़की से बाहर कोई रेल मेरी नींद में
धड़धडाती हुई गुज़र रही है रोज़ !

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SLUMBER


As if it’s a slumber
From the warring days
Leaving one deep in anxiety

As if it’s a vigil on the river
As it roars away
In fury

As if it's the moment before
The plunge into endless waters
By the sparrows
Tired beyond their will
To get across the sea

Years grow on us
And some passion within ebbs
Memories dying along the way

One’s anxiety -
As if its a lifetime suffered
In a letter from the battlefield
That never arrived

Slow moves the time
And our slumber gets enmeshed
Skilfully
Into a web we’ve made ourselves

It’s as if in the thick of a deal
A train rattles past my window
Into my dream
Everyday

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Translated from Hindi by Girdhar Rathi

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चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार
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मंगलवार, 13 जुलाई 2010

किवाड़





इस भारी से उँचे किवाड़ को देखती हूँ
अक्सर
इसके उँचे चौखट से उलझ कर सम्भलती हूँ
कई बार

बचपन में इसकी साँकलें कहती थीं
- एड़ियाँ उठा कर मुझे छुओ तो!

अब यहाँ से झुक कर निकलती हूँ
और किवाड़ के ऊपर फ्रेम में जड़े पिता
बाहर की दुनिया में सम्भल कर
मेरा जाना देखते हैं!


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चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार
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मंगलवार, 8 जून 2010

नेहरू विहार






कहा जाता है कि दिल्ली मे वह एक

बसाई हुई जगह थी

उस बसाई हुई जगह में कुछ बूढे बचे थे

जिनके पास विभाजन की स्मृतियाँ थीं

बहुत भाग - दौड़ कर जिन्दगी बसर कर लेने के लायक

सवा कट्ठे की ज़मीन हासिल करने की यादें थीं



वहाँ कुछ भयाक्रांत कर देने वाले विवरण थे

जीवन के लिये संघर्ष और आदमी के प्रति

आस्था - अनास्था के किस्से थे


उस सवा कटठे की जमीन पर बसाई गई जिन्दगी में आंगन नहीं थे

गलियाँ थीं...अंतहीन भागमभाग और काम में लगे स्त्री - पुरुष

321 नम्बर की बस पकड़ कर उस रूट के कामगारों को काम के अड्डे तक पहुँचना होता था


वहाँ सपने थे

थोडी धूप और हवा थी जो धुएँ और शोर में

लिपट गई थी



औरतों के लिये इतवार था...पर्व थे

वे उन्हीं दैत्य-सी दिखतीं रेड -ब्लू लाईन बसों में

रकाबगंज गुरुद्वारा चांदनी चौक के मंदिर या फिर लाल किले

जैसी ऐतिहासिक जगहों पर कभी - कभार जाती थीं


कहा जा सकता है कि वहाँ ईश्वर था!

जे अलसुबह उठ पाते थे-घंटिया बजाते थे



दो मकानों के बीच चौड़ी गलियाँ थीं

वहाँ गर्मी और उमस भरी रातों में औरतें और जवान लडकियाँ

बेतरतीबी से सो जाती थीं

गलियों में अलगनी थी जहाँ औरतों मर्दां बच्चों के कपडे

सूखते रहते थे

जिन्दगी की उमस के बीच देर रात तक

नई-पुरानी फिल्मों के गीत बजते थे

उन्हीं गीतों से जवान दिलों में

उस ठहरी हुई जगह में प्यार के जज़्बे उठते थे

कोई सिहरन वाला दृश्य आँखों के सामने फिरता था



उस बसाई हुई जगह पर बसे हुए लोगों ने

किरायेदार रख लिये थे -ये किरायेदार

दिल्ली की आधी आबादी थे

उन्हें महीने के आखि़री दिनों का इन्तज़ार रहता था



वह दिल्ली का बसाया हुआ इलाका था

दिल्ली पूरी तरह बाजार में बदल गई थी

ग़ौरतलब है कि फिर भी उस इलाके में

हाट लगती थी !


आस्था की बेलें मर रहीं थीं

लेकिन वहाँ हाट की संस्कृति बची थी

कुछ चीजें अनायास ओर खामोशी से

हमारे साथ चलती हैं ऐसे ही...जैसे...

दिल्ली में हाट



दिल्ली में चौंकना आपके भीतर की संवेदना के

बचे होने की गारंटी है!



उसमें पुराने लोग बचे थे

वहाँ पुरानी स्मृतियाँ थीं...

जहाँ विश्वासघात का अंधेरा था

उनके भीतर अपनी ही मिट्टी से उखड जाने

की आह थी

जो कभी -कभी उभरती थी



वे अक्सर गलियों में अकेले

हुक्का गुड़गुड़ाते कहीं भी आंखें स्थिर किये

बैठे पाये जा सकते थे



कुल मिला कर दिल्ली का वह इलाका था

अपनी बेलौस और रुटीनी दिनचर्या में व्यस्त

जिजीविषा के एक अनजाने स्वाद से भरा हुआ


जिजीविषा - जो उखड गई अपनी मिट्टी से

या जो पेशावर एक्सप्रेस से आकर

दिल्ली की आबोहवा में घुल गई



-लेकिन अब कहना चाहिये कि

इस महादेश के कई हिस्से

नेहरू विहार में तब्दील हो रहे हैं!

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चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार
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गुरुवार, 6 मई 2010

चुप नहीं रह सकता आदमी





चुप नहीं रह सकता आदमी
जब तक हैं शब्द
आदमी बोलेंगे

और आदमी भले ही छोड़ दे लेकिन
शब्द आदमी का साथ कभी छोड़ेंगे नहीं

अब यह आदमी पर है कि वह
बोले ...चीखे या फुसफुसाये

फुसफुसाना एक बड़ी तादाद के लोगों की
फितरत है!

बहुत कम लोग बोलते हैं यहाँ और...
चीखता तो कोई नहीं के बराबर ...

शब्द खुद नहीं चीख सकते
उन्हें आदमी की जरूरत होती है
और ये आदमी ही है जो बार-बार
शब्दों को मृत घोषित करने का
षड्यंत्र रचता रहता है!

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चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार
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